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गिम्मी फाउंडेशन परिचय

एक प्रीमियम सांस्कृतिक और परोपकारी फाउंडेशन, जो साहित्यिक विरासत और बहुभाषी सम्मान पर आधारित है।

फाउंडेशन, अभिलेख और मीडिया आवाज़

गिम्मी फाउंडेशन एक प्रीमियम सांस्कृतिक मंच है: साहित्यिक परोपकार, पंजाबी भाषा संरक्षण, बहुभाषी सम्मान, मीडिया कहानी और नई प्रतिभा के लिए व्यावहारिक रास्ता।

संक्षेप में

  • छात्रवृत्ति, पुस्तक पुनर्प्रकाशन और पंजाबी सांस्कृतिक कार्यक्रम — प्रिंट अभिलेख में दर्ज।
  • Gimmi TV UK — इंटरव्यू, गीत, कविता और जागरूकता कार्यक्रम प्रवासी दर्शकों के लिए।
  • नई प्रतिभा संपर्क से प्रोफाइल भेज सकती है; प्रकाशित कृतियाँ पुस्तकें अनुभाग में।

नेतृत्व

संस्थापक

Saleem Khan Gimmi — पंजाबी लेखक, मार्गदर्शक और साहित्यिक संरक्षक

पंजाबी लेखक, मार्गदर्शक और साहित्यिक संरक्षक

Saleem Khan Gimmi

फाउंडेशन पुनर्प्रकाशित पुस्तकों, सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण और नई पीढ़ी के लिए भाषा संरक्षण से उनकी साहित्यिक रोशनी को आगे बढ़ाता है।

Shagufta Gimmi Lodhi — संस्थापक, प्रस्तोता और Gimmi TV UK की सार्वजनिक आवाज़

संस्थापक, प्रस्तोता और Gimmi TV UK की सार्वजनिक आवाज़

Shagufta Gimmi Lodhi

लाहौर में जन्म, लंदन निवासी; पंजाबी, उर्दू, अंग्रेज़ी लेखिका; Gimmi TV UK और सलीम खान गिम्मी की विरासत।

जीवनी

सलीम खान गिम्मी

सलीम खान गिम्मी उन पंजाबी साहित्य के अग्रणियों में हैं जिन्होंने कलम को केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं माना, बल्कि अपनी धरती, अपनी भाषा और अपने लोगों की गहरी सचाइयों से बुनकर उसे जीवंत इतिहास बना दिया। उन्हें औपचारिक परिचय की आवश्यकता नहीं — वे केवल उपन्यासकार नहीं थे, बल्कि एक युग-निर्माता व्यक्तित्व थे। रेडियो प्रसारक, फ़ीचर लेखक, नाटककार, कहानीकार, जीवनीकार, आलोचक और भाषा के जानकार के रूप में उनकी विरासत पंजाब के साहित्यिक नक्शे पर एक अमिट रेखा है।

सलीम खान गिम्मी का जन्म 29 जून 1932 को करीम दाद खान के परिवार में पंजाब के जिला गुरदासपुर, तहसील व जिला गुरदासपुर, पुलिस स्टेशन दीनानगर, पोस्ट ऑफ़िस झपकरा, गाँव जैनपुर में हुआ। उनके पिता, जो स्वयं पढ़े-लिखे थे, ब्रिटिश काल में डाक विभाग में कर्मचारी रहे। उनकी माँ ख़दीजा बेगम गृहिणी थीं। सलीम खान गिम्मी की दो बहनें थीं। माता-पिता के सबसे छोटे और इकलौते बेटे होने के कारण उन्हें अत्यधिक स्नेह और लाड़ मिला।

सलीम खान गिम्मी के पूर्वज सुल्तान महमूद गज़नवी के युग में अफ़गानिस्तान से उपमहाद्वीप आए। वे पश्तूनों की लोदी क़बीले से थे। पंजाब में उन्होंने गाँव नौशहरा, पोस्ट ऑफ़िस भिखो चक, तहसील शकरगढ़, जिला गुरदासपुर में बसावट की। गिम्मी के एक पूर्वज जौहर खान ने 1857 की स्वतंत्रता संग्राम में जनरल निकसन के विरुद्ध सक्रिय भाग लिया।

गिम्मी के गाँव में औपचारिक शिक्षा की परंपरा नहीं थी, क्योंकि पूरा समुदाय कृषि से जुड़ा था। सलीम खान गिम्मी अपने गाँव के एकमात्र विद्यार्थी थे। उन्होंने पाँचवीं कक्षा तक प्राथमिक शिक्षा झपकरा प्राइमरी स्कूल से प्राप्त की। प्राथमिक पूर्ण करने के बाद वे गुरदासपुर के दोरांगला में हिंदू हाई स्कूल में दाखिल हुए। ज्ञान के अथाह चाहत के कारण वे प्रतिदिन लगभग बारह मील पैदल चलकर स्कूल जाते थे। पाकिस्तान के क़याम के समय वे नौवीं कक्षा में थे। उन्होंने 1948 में मैट्रिक इस्लामिया हाई स्कूल मंगरी से पास किया और बाद में इस्लामिया कॉलेज लाहौर में प्रवेश लिया।

प्रकाशित कृतियाँ देखें

साहित्यिक परिचय

शगुफ्ता गिम्मी लोधी — बहुआयामी साहित्यिक सफर

डॉ. अमजद अली भट्टी

शगुफ़्ता गिम्मी लोधी उन साहित्यकारों में हैं जिनकी पहचान किसी एक कोटि में बाँधी नहीं जा सकती। वे कवयित्री भी हैं, शोधकर्ता भी, आलोचक भी, अनुवादक भी, कथा-लेखिका भी, और अपने युग के सामाजिक व साहित्यिक वाद-विवादों में सक्रिय आवाज़ भी। उनके व्यक्तित्व का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि वे साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं मानतीं बल्कि उसे सांस्कृतिक चेतना, विद्वत् सेवा और सामाजिक जागरूकता से जोड़ देती हैं। उनका साहित्यिक सफ़र इस बात की गवाही देता है कि जब एक संवेदनशील मन परंपरा, अध्ययन, अनुभव और सामाजिक भावना से तालमेल बैठाता है तो वह केवल पुस्तकें नहीं लिखता, अपने परिवेश के बौद्धिक नक्शे पर एक नई रेखा खींच देता है।

लाहौर में जन्मी और अब लंदन में निवासी शगुफ़्ता गिम्मी लोधी के भीतर पूर्वी सभ्यता की वह कोमलता भी है जो अपने अतीत से जुड़ी रहती है, और वह बौद्धिक विस्तार भी जो नए युग के प्रश्नों से आँखें नहीं मोड़ता। इसीलिए उनकी लेखनी में एक ओर मिट्टी की ख़ुशबू मिलती है, तो दूसरी ओर वर्तमान की जटिलताओं का स्पष्ट बोध भी। वे केवल उस साहित्यिक परिवार की सदस्य नहीं हैं जिसने उन्हें कलम और विचार का विरासत दिया, बल्कि उन्होंने स्वयं अपनी मेहनत, रुचि और विद्वत गंभीरता से उस विरासत को आगे बढ़ाया है।

उनके पिता सलीम खान गिम्मी अपने समय के एक महत्वपूर्ण साहित्यिक नाम थे। शोधकर्ता, आलोचक, अनुवादक और कथा-लेखक के रूप में उनकी पहचान दृढ़ थी। ऐसे पिता की पुत्री होना स्वयं एक संबंध है, किंतु उस संबंध को अपनी रचनात्मक प्रवृत्ति में ढालकर आगे बढ़ना अलग उपलब्धि है। शगुफ़्ता गिम्मी लोधी ने पिता की साहित्यिक व्यक्तित्व को केवल पारिवारिक गौरव नहीं माना बल्कि उसे ज़िम्मेदारी के रूप में अनुभव किया। यही भावना उन्हें उस स्थान तक ले आई जहाँ वे स्वयं एक स्वतंत्र साहित्यिक पहचान बन गईं। उनमें दिखने वाली शोध गंभीरता, आलोचनात्मक संतुलन और भाषा से हार्दिक लगाव में पारिवारिक शिक्षण का योग अवश्य है, किंतु यह सब केवल विरासत का परिणाम नहीं बल्कि व्यक्तिगत संघर्ष और निरंतर अभ्यास की उपज भी है।

शगुफ़्ता गिम्मी लोधी की रचनात्मक पहचान की चर्चा में उनके पंजाबी उपन्यास झल्ली का उल्लेख अनिवार्य है। इस उपन्यास ने उन्हें कवयित्री या अनुवादक के दायरे से निकालकर ऐसी कथा-लेखिका के रूप में सामने लाया जो मानव अंतःकरण के टूटने, सामाजिक दबाव, स्त्री के आंतरिक पीड़ा और जीवन से जुड़े जटिल प्रश्नों को कलात्मक ढंग से व्यक्त करना जानती है। कथा में सफलता केवल कहानी सुनाने का नाम नहीं, यह देखने का नाम है कि लेखक मनुष्य के भीतर कितनी गहराई तक उतर सका। झल्ली का महत्व यही है कि उसमें सतही भावनात्मक लेखन नहीं बल्कि अनुभव की सच्चाई है। इस प्रकार के उपन्यास यह अहसास दिलाते हैं कि स्त्री को केवल विषय नहीं, बल्कि जीवंत, सचेत अस्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

उपन्यास झल्लीसभी प्रकाशन

प्रशंसापत्र

शगुफ्ता गिम्मी लोधी पर साहित्यिक प्रतिक्रियाएँ

ज़ाहिद हसन

शगुफ़्ता गिम्मी विदेश में लंबे समय से रह रही हैं, फिर भी उनकी पंजाबी लेखनी पढ़कर ऐसा लगता है जैसे वे पंजाब में ही रह रही हों — या पंजाब उनके भीतर बसा हो। उनकी रचनाएँ इसी तरह बुनी और जीवंत हैं — और क्यों न हों? वे प्रतिबाशाली पंजाबी लेखक, भाषाविद, विचारक और कथाकार सलीम खान गिम्मी की प्रतिभाशाली और प्रसिद्ध पुत्री हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत के विकास में लगा दिया।

शगुफ़्ता गिम्मी स्वयं शोध विद्वान, अनुवादक और उपन्यासकार हैं; इसके अतिरिक्त उनकी 'कैंसर और उसकी किस्में' नाम की पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। मेरा मानना है कि पंजाबी भाषा की समृद्धि के लिए ऐसे विविध, उत्कृष्ट और नए विषयों पर लिखने की बड़ी आवश्यकता है ताकि पंजाबी में अच्छी पुस्तकें बढ़ें — और इसी भाव से उन्होंने पंजाबी लोकगीतों और रीति-रिवाजों पर भी एक और सुंदर पुस्तक लिखी है, जो जन्म से मृत्यु तक पंजाब में होने वाली रस्मों, रीतियों और गीतों तथा पंजाबी संस्कृति से विश्वभर के लोगों को परिचित कराने का सुंदर कार्य होगी। उन्होंने अपने पिता की महत्वपूर्ण पुस्तक 'पंजाब और पंजाबी' का उर्दू अनुवाद भी किया है और विश्वविद्यालयों में शोध पर लिखा है।

आज वे दो और महत्वपूर्ण मोर्चों पर कार्य कर रही हैं: एक गुरु नानक के मुस्लिम साथी और रबाबी भाई मर्दाना पर शोध-पूर्ण पुस्तक है, और साथ ही 'पंजाबी फ़िल्म का विकास' शीर्षक पर उत्कृष्ट कार्य कर रही हैं।

संबंधित पुस्तक

हफ़ीज़ ताहिर

झल्ली पूरे युग की कहानी है जिसे हमारी पीढ़ी ने जिया है। उसके सभी पात्र जीवित और आज भी प्रासंगिक हैं।

लड़की, उसके माता-पिता, प्रगतिशील और अप्रगतिशील, ईमानदार और पाखंडी, प्रेम करने वाले और धोखा देने वाले — ये सब लोग आज भी हमारे आस-पास हैं। पर वह पेड़ अब नहीं रहा जिसके सामने झल्ली अपना दुख बयान करती थी।

शगुफ़्ता गिम्मी ने यह उपन्यास दिल से लिखा है, और ऐसा लगता है जैसे झल्ली स्वयं हमें अपनी कहानी सुना रही हो। यह उपन्यास आने वाली अनेक पीढ़ियों के लिए प्रासंगिक रहेगा।

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अमृतजीत चंदन

यहाँ यूके के साहित्यिक मेलों में शगुफ़्ता गिम्मी लोधी से मिलना होता रहता है। साहित्य और अन्य विषयों पर उनके विचार जानने का अवसर मिला है। वे मातृभाषा पंजाबी की सच्ची सेविका हैं।

शगुफ़्ता बड़ों का बहुत आदर करती हैं। मैंने उनकी लेखनी पढ़ी है, कविता भी और उपन्यास भी। उनका उपन्यास 'झल्ली' प्रगतिशील साहित्य का उत्कृष्ट नमूना है।

इस उपन्यास में पश्चिमी पंजाब के भीतर समाजवादी लहर का जो चित्रण है, वह भाग मुझे बहुत भाया। उपन्यास में असलम नाम का पात्र उस समय के कॉमरेडों की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है।

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खालिद फरहाद धारीवाल

शगुफ़्ता गिम्मी लोधी हमारे समय की एक महत्वपूर्ण लेखिका हैं। बहुत कम समय में उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में अपनी ठोस पहचान बना ली है।

मैंने उनका उपन्यास 'झल्ली' पढ़ा है। यह उपन्यास पंजाबी समाज में स्त्री के वास्तविक जीवन का सच्चा और दर्दनाक चित्र प्रस्तुत करता है।

उपन्यास की मुख्य पात्र फिरदौस ऐसी स्त्री है जो पढ़ी-लिखी और सक्षम होते हुए भी अनादर का सामना करती है।

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मूल्य

पहचान मिटाए बिना एकता

आनंद, प्रेम, गरिमा, स्वतंत्रता और सच्ची अभिव्यक्ति का मंच।

पंजाबी विरासत, वैश्विक सम्मान

पंजाबी को सभी भाषाओं और संस्कृतियों के सम्मान के साथ मनाया जाता है।

नई आवाज़ों को मंच

ज्ञात और नए कलाकारों को दस्तावेज़, इंटरव्यू और व्यापक दर्शकों तक पहुँचाया जाता है।

संपादकीय समयरेखा

विरासत

सलीम खान गिम्मी का साहित्यिक कार्य फाउंडेशन की सांस्कृतिक रीढ़ बनता है।

प्रिंट

छात्रवृत्ति, प्रायोजित प्रकाशन और पुस्तक पुनर्प्रकाशन संरचित सामाजिक प्रभाव बनते हैं।

मीडिया

Gimmi TV UK मिशन को इंटरव्यू, गीत, कविता, व्लॉग और जागरूकता शो तक फैलाता है।